7 Chakra Healing

7 चक्र ध्यान हीलिंग ही क्यों ?

एक युग ऐसा था जब सभी मानव की दिव्य शक्ति जाग्रति थी लेकिन मानव ने उस दिव्य शक्ति का इतना दुरुपयोग किया ब्रम्हा जी ने सभी मानव की दिव्य शक्तियों को छीन लिया और तब तक छिपने का फैसला किया जब तक कि मानव इसे पाने के लायक नहीं हो जाता। ब्रम्हा जी के पास एक समस्या आ गई इस दिव्य शक्ति को कहाँ छिपाया जाए ताकि कोई खोज न सके।ब्रम्हा जी ने सभी देवी - देवता बुलाया और समस्या सामने रखी। पहला प्रस्ताव आया इस दिव्य शक्तियों को धरती के नीचे दबा दिया जाए।ब्रम्हा जी मे अस्वीकृत करते हुए बोले नही यह बहुत खतरनाक होगा कोई भी कभी भी धरती इसको खोद कर उसे निकाल लेगा।

दूसरा प्रस्ताव आया इस दिव्य शक्ति को सागर की गहराईयो में छुपा देना चाहिए।ब्रम्हा जी ने फिर से अस्वीकृत कर दिया मानव को पता चल गया तो वो सागर में जा कर खोज लेगा।पूरे संसार में इस दिव्य शक्ति को छिपाने लायक कोई स्थान नही मिल रहा था सारे देवी देवता परेशान पर देवों के देवो महादेव के पास जाकर पूछे अब क्या किया जाए तो महादेव ने कहा"इस दिव्य शक्ति को मानव के भीतर ही छुपा दे वह कभी अपने भीतर झांककर इसे खोजने के बारे में सोच भी नही पाये। ब्रम्हा जी ने ऐसा ही किया सारी दिव्य शक्ति मानव के अंदर भीतर छुपा दी इसलिए सफलता भीतर से आती है खुशी भीतर है और मानव बाहर खुशी खोजने में लगा है। अगर मानव अपने अंदर देख ले तो जीवन में सुख शांति समृद्धि आसानी से पा सकता है।

सारी शक्तियां मानव के भीतर है। अगर मानव इन शक्तियों को अपने भीतर जाकर जागृत करे तो उसका जीवन सफल बन सकता है। शक्तियां होती कहां है मानव के प्राणमय शरीर में सात ऊर्जा केंद्र हैं जिन्हें 7 चक्र कहा जाता है पहला मूलाधार चक्र दूसरा स्वाधिष्ठान चक्र तीसरा मणिपुर चक्र चौथा अनाहत चक्र पांचवा विशुद्ध चक्र छटवा आज्ञा चक्र सातवा सहस्त्रार चक्र यह सभी चक्करों में ऊर्जा का केंद्र है,अगर इन चक्रों को जागृत कर लिया जाए या उनकी नेगेटिव एनर्जी को बाहर निकाल दिया जाए तो जीवन में सब कुछ बेहतर रूप से प्राप्त होने लगेगा यही है भीतर की शक्ति को जागृत करना सात चक्रों को heal करना |प्राणमय शक्ति से उपचार की कला को वैज्ञानिक रूप दिया। उनकी यह कला शरीर के 7 चक्रों पर आधारित है। इस सिद्धान्त के अनुसार मानव शरीर चक्रों से संचालित होता है। चक्र तेजी से घूमने वाले ऊर्जा केन्द्र हैं, जो प्राणमय शक्ति को सोखकर, शरीर के विभिन्न भागों तक पहुंचाते हैं। चक्रों ऊर्जा शक्ति का कम होना सारी बीमारियों का कारण है। 7 चक्रो में नकारात्मक ऊर्जा शक्ति का होना। मूलाधार चक्र- यह चक्र रीढ़ के अन्तिम छोर पर स्थित होता है। मूलाधार चक्र मांसपेशियों और अस्थि तन्त्र, रीढ़ की हड्डी साफ रक्त के निर्माण, अधिवृक्क ग्रन्थियों, शरीर के ऊतक और आन्तरिक अंगों को नियन्त्रित करता है। यह चक्र जननांगों को भी प्रभावित करता है। इस चक्र के गलत ढंग से कार्य करने पर जोड़ों का दर्द, रीढ़ की हड्डी का रोग, रक्त के रोग, कैंसर, हड्डी का कैंसर, ल्यूकेमिया, एलर्जी, शरीर विकास की समस्या, जीवनशक्ति की कमी, जख्म भरने में देरी और हडि्डियों के टूटन की शिकायत होती है। जिन व्यक्तियों को मूलाधार चक्र बहुत अधिक सक्रिय होता है, वे हृष्ट-पुष्ट और स्वस्थ्य होते हैं और जिनका मूलाधार चक्र कम सक्रिय होता है वे नाजुक और कमजोर होते हैं। स्वाधिष्ठान चक्र- यह चक्र जननांग क्षेत्र में स्थित होता है। यह जननांगों व ब्लैडर को नियन्त्रित करता और ऊर्जा प्रदान करता है। इस चक्र के कार्य में गड़बड़ी होने पर काम सम्बंधी समस्याएं पैदा होती है। माठीपुर चक्र- यह चक्र नाभि के ठीक पीछे पीठ में स्थित होता है। यह मूलाधार चक्र से आने वाली सूक्ष्म प्राणशक्ति को ऊपर की ओर भेजने के लिए रीढ़ की हड्डी में पंपिंग स्टेशन की तरह कार्य करता है। यह गुर्दे और अधिवृक्क ग्रन्थियों को नियन्त्रित करने का कार्य करता है। इस चक्र के कार्य में गड़बड़ी होने पर गुर्दे की बीमारी, जीवनशक्ति में कमी, उच्च रक्तचाप और पीठ दर्द होते हैं। यह छोटी व बड़ी आन्त और एपेण्डिक्स को नियन्त्रित करता है। इस चक्र के ठीक से कार्य न करने पर कब्ज, एपेण्डिसाइटिस, शिशु-जन्म में कठिनाई, ओजिस्वता में कमी, एवं आन्त सम्बंधी रोग होते हैं। अनाहत चक्र- यह बायीं निचली पसरली के मध्य में स्थित होता है। इसमें गड़बड़ी से सामान्य कमजोरी व रक्त सम्बंधी बीमारी होती है। छाती के डायफ्राम, अग्नाशय, जिगर, आमाशय, फेफड़े, हृदय को नियन्त्रित करता है। इस चक्र के गलत ढंग से कार्य करने पर मधुमेह, अल्सर, यकृतशोथ, हृदय रोग होते हैं। थायमस ग्रन्थि और रक्त संचार तन्त्र को नियन्त्रित करता है। इसकी गड़बड़ी से हृदय, फेफड़ा, रक्त सम्बंधी रोग होते हैं। विशुद्ध चक्र- यह गले के बीच में होता है, जो थायराइड ग्रन्थि, गला और लिंफेटिक तन्त्र को नियन्त्रित करता है। इसकी गड़बड़ी से घेंघा, गले में खराश, दमा आदि रोग होते हैं। आज्ञा चक्र- चह भौंह के मध्य स्थित होता है। यह पीयूष ग्रन्थि व अन्त:स्रावी ग्रन्थि को नियन्त्रित करता है। इसके ठीक ढंग से कार्य न करने पर मधुमेह हो सकता है। यह आंख व नाक को भी प्रभावित करता है। सहस्त्रार चक्र- यह चक्र ललाट यानि माथे के बीच स्थित होता है। यह पीनियल ग्रन्थि और तन्त्रिका तन्त्र को नियन्त्रित करता है। इसके ठीक तरह से कार्य न करने पर यादाश्त में कमी, लकवा और मिरगी जैसे रोग हो सकते हैं।